धरती की ये पुकार है ।
कितना प्यारा रूप है इसका ,
कितना अनमोल उपहार है।
पूरी होती हर अभिलाषा,
हम पर ये उपकार है।
मत छेड़, अपने स्वार्थ के लिए,
यह प्रकृति इसका श्रृंगार है।
तू सर्वशक्तिमान है,
यह केवल तेरा अहंकार है।
ईश्वर की इस संरचना पर,
यह जो तेरा प्रहार है।
तू ईश्वर नहीं हैं मानव है,
किस भ्रम का तू शिकार है।
ये कैसी विडम्बना है ये कैसा अंधकार है,
कहीं पसरा मातम कहीं चीख पुकार है।
कहीं विकास हैं तो कहीं विनाश हैं,
कहीं रोशनी हैं तो कहीं अंधकार हैं।
वनों की पुकार पर बादलों की दहाड़ हैं,
उफनती नदिया हैं दरकते पहाड़ हैं ।
डर के साये मे जीवन हैं,
नींद हो चुकी हराम है।
कैसे बचेगा आशियाना अपना ,
जहन में यही विचार हैं।
एक सौगंध उठानी हैं एक सकल्प दोहराना हैं ,
बचाकर अस्तित्व इस प्रकृति का यह कर्तव्य निभाना हैं ।
बस एक पेड़ लगाकर,
इस माँ का कर्ज चुकाना है।
यह जीवन हम पर उधार है,
धरती की ये पुकार है।
धरती की ये पुकार है। धरती की ये पुकार है ।।
Mrs. Jyoti Sharma


